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रचनाएँ hindihaiga@gmail.com पर भेजें - ऋता शेखर मधु

Wednesday, 27 November 2013

ख़्वाबों की खुश्बू- हाइकु जगत के सुरभित फूल

ख़्वाबों की खुश्बू- हाइकु जगत के सुरभित फूल

अभी हाल में ही मुझे तीन हाइकु संग्रह मिले|

१.माटी की नाव-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
२.ख़्वाबों की ख़ुश्बू-डॉ हरदीप कौर संधु
३.मन के द्वार हजार-रचना श्रीवास्तव

सर्वप्रथम मैंने डॉ हरदीप जी के एकल हाइकु संग्रह को पढ़ा|पूरे हाइकु को नौ खंडों में बाँटा गया है, हर खंड किसी खास विषय या भाव को समर्पित हैं| सहज स्वभाविक अभिव्यक्ति उनके हाइकुओं की खासियत होती है|बहुत ही सुंदर कलेवर में सजी हाइकु पुस्तक में ५९८ हाइकु हैं|वरिष्ठ हाइकु लेखिका आ० सुधा गुप्ता जी ,आ० रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी,डॉ भावना कुँअर जी एवं रचना श्रीवास्तव जी ने पुस्तक के लिए अपनी शुभकामनाएँ दी हैं| पुस्तक पढ़ते हुए मन ने जहाँ पर भी वाह कहा वहाँ ठिठकी, फिर से पढ़ा और उन भावों में डूब सी गई|मन में उठते भाव को अभिव्यक्त किए बिना मैं न रह सकी|महसूस कीजिए ख़्वाबों की खुश्बू मेरी कलम से...आशा है इन हाइकुओं पर मैं अपने भाव प्रेषित करने में सफल हो पाऊँगी|

2-KHAVABON KI KHUSHABU-1

पुस्तक खोलते ही सबसे पहले प्रथम हाइकु ने ही मन को मोह लिया|

मन ही है जो क्षण भर में ही हजारों किलोमीटर की दूरी को पार कर जाता है, बहुत सहज अभिव्यक्ति !

पत्र जो मिला/लगा बहुत पास/दूर का गाँव

बचपन माता पिता के अलावा नानी-दादी की बाहों को भी नहीं भूलता, इसे बताते सारे हाइकु संयुक्त परिवार के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं|

क्या था ज़माना/बड़ा था परिवार/एक ठिकाना
कैमरा क्लिक/मुँह छुपाए अम्मा/ताई कहे न
बादल आए/दादी न चैन पाए/उपले ढके
नानी के बाल/तेल सरसों लगा,/सोने के तार
रात अँधेरी/दे रही है पहरा/बापू की खाँसी
दादी के बाद/संदूक व चरखा/एक कोने में

यादें मन की परतों पर अपना खास स्थान रखती हैं और इन यादों को हरदीप जी ने इस तरह से सँभाला है|

बिखरी यादें/मन के आँगन में/अमोल हीरे
पाखी है यादें/मन खुला आसमाँ/उड़ी ये यहाँ
ठंढक मिली/आया जब यादों का/नाज़ुक झोंका
कुछ पिघला/जाग गईं सुधियाँ/आँखें सजल

जब नारी माँ बनती है तो बहुत सारे सुखद अहसास से गुजरती है,उस एहसास की खुश्बू पाठकों तक इस प्रकार पहुँची|

जन्मी बिटिया/लगा आठो पहर/गूँजते गीत
जन्मी बिटिया/अलगनी पे टँगे/रंगीन फ्राक
गोद में नन्ही/माँ के आँचल में ज्यों/खिली चाँदनी
शिशु जो रोए/माँ के मोम दिल को/कुछ-कुछ हो

माँ-बेटी के प्यार को हाइकु में इस तरह पिरोया है लेखिका ने|

माँ हर दिन/मुझसे बतियाती/मेरे मन में
बात जाने वो/चेहरा पढ़कर/अंतर्यामी माँ
माँ और बेटी/सुख दुख टटोलें /टेलीफोन से

एक अच्छा और सच्चा दोस्त सौभाग्य से ही मिलता है, दोस्ती पर बड़े ही नायाब हाइकु हैं पुस्तक में|

सर्द माथे पे/है गर्म हथेली की/छुअन दोस्ती
दोस्ती लगी/महकते फूलों की/मीठी खुश्बू

ज़िन्दगी के सफ़र में अनुभव मिलते गए और उन भावों को बटोरकर हाइकु बनते गए,देखिए|

साया ही तो है/हमारी ये ज़िन्दगी/धूप-छाँव का
दुःख आएँ तो/तब यही ज़िन्दगी/लगे कुरूप
साँसों की किश्ती/हवाओं के सहारे/तैरती रही
रक्त से नहीं/हृदय से बनते/पावन रिश्ते
कैसी वाटिका/जहाँ रंग-बिरंगे/फूल लापता

कुछ अनोखे सच से लेखिका ने इस प्रकार से परिचय करवाया|

खाने वालों की/  उठा रहे जूठन/ये भूखे बच्चे
ऊँचे मकान/रेशमी हैं परदे/उदास लोग
किया उजाला/काजल भी उगला/दीप जो जला
गैरों ने मारा/अब अपने मारें/आज़ाद हम

प्रकृति का सौन्दर्य,तपन-शीतलता-स्वाद, इन सबको हाइकु में यूँ उकेरा गया है...
ग्रीष्म ऋतु में/देखे जो आम/टपके लार
छत पे सोए/बारिश अचानक/भागना पड़ा
किरणें ओढ़/सोने सी सुनहरी/आया बसंत
जेठ महीना/अंगार हैं झरते/तपता सूर्य
फूल मनाए/वेलेनटाइन डे/कलियों संग
गर्मी सताए/घुँघरु लगी पंखी/जान बचाए

अब कुछ पावन एहसास...

तू चुप रहा/चेहरा करे बयाँ/ये सारी दास्ताँ
ढूँढा बहुत/कहीं ढूँढ न पाए/हृदय-धन
जब हो दर्द/बस एक चाहिए/तुम्हारा स्पर्श
खुली किताब/गिरा सूखा गुलाब/चमकी यादें

पुस्तक के संसार-सरिता खंड में डुबकी लगाई तो हाइकु मोतियों की चमक भावविभोर कर गई|

नज़रें मिलीं/चाहत के हाशिए/छलक उठे
जब तू हँसी/फ़िज़ा में चाँदनी/फैलने लगी
सावन-घटा/रोम-रोम थिरका/रस छलका
दग़ा न देगा/चोंच जो दी उसने/चुग्गा भी देगा

पुस्तक का अन्तिम खंड-त्रिंजन अर्थात गाँव की हँसती गाती लडँकियों का समूह,इसी त्रिंजन को आधार बनाकर हरदीप जी ने ५० हाइकु बनाए हैं|

मन त्रिंजन/सदियों से बंजारा/घूमे आवारा
मन-त्रिंजन/लो तेरी याद आई/हँसी तन्हाई
कात रे मन/संसार-त्रिंजन में/मोह का धागा
जग त्रिंजन/अनजान नगरी/कहाँ ठिकाना

''ख़्वाबों की खुश्बू'' बहुत ही मनमोहक है, पुस्तक एक बार पढ़ना शुरु किया तो अन्त तक पढ़कर ही मन मानता है| आप भी पढ़ें,निःसंदेह इसकी खुश्बू से सराबोर हुए बिना नहीं रहेंगे आप...शुभकामनाओं सहित...ऋता शेखर 'मधु'

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (28-11-2013) को "झूठी जिन्दगी के सच" (चर्चा -1444) में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ramakant Singh said...

Behatarin samiksha